फलाई तंजीम, पालघर झोन के राशन वितरण पर सवाल गरीबों की मदद या उनकी मजबूरी का सार्वजनिक प्रदर्शन?

    फलाई तंजीम, पालघर झोन के राशन वितरण पर सवाल गरीबों की मदद या उनकी मजबूरी का सार्वजनिक प्रदर्शन?

     

    पालघर | 26 अगस्त 2026.

    ईद-ए-मिलादुन्नबी ﷺ के मुबारक मौके पर फलाई तंजीम, पालघर झोन की ओर से करीब 105 जरूरतमंद परिवारों को राशन वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना निश्चित रूप से नेक और सराहनीय काम है। किसी जरूरतमंद के घर राशन पहुँचना और उसके परिवार का सहारा बनना इंसानियत की खूबसूरत मिसाल है।

    लेकिन इस पूरे कार्यक्रम को लेकर कुछ गंभीर सामाजिक सवाल भी सामने आ रहे हैं।

    गरीबों की मदद या उनकी मजबूरी का सार्वजनिक प्रदर्शन?

    कार्यक्रम के दौरान जरूरतमंद लोगों को सार्वजनिक रूप से बुलाकर राशन दिया गया। इस दौरान फोटो और वीडियो बनाए गए और सोशल मीडिया पर प्रसारित किए गए।सवाल यह है कि जिस गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति की मदद की जा रही है, उसकी इज्जत, निजता और आत्मसम्मान का भी क्या उतना ही ध्यान रखा गया?

    मदद करनी है तो जरूर करें, लेकिन क्या जरूरतमंद व्यक्ति का चेहरा कैमरे के सामने लाना और उसकी मजबूरी को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करना जरूरी है?अगर किसी गरीब की मदद की जा रही है, तो उसका चेहरा ब्लर किया जा सकता था, उसकी पहचान छिपाई जा सकती थी या उसकी अनुमति लेकर ही फोटो-वीडियो बनाया जा सकता था। गरीबी किसी व्यक्ति का अपराध नहीं है और जरूरतमंद होना किसी की शर्म नहीं है।

     

    ज़कात की अमानत पर पालघर की अवाम से सीधा सवाल

    पालघर की अवाम से मेरा एक अहम सवाल है आप अपनी ज़कात का पैसा फलाई तंजीम, पालघर झोन को क्यों देते हैं?एक किट, दो किट, तीन किट या अपनी हैसियत के मुताबिक आप जो ज़कात देते हैं, वह पैसा गरीबों, जरूरतमंदों और हक़दार लोगों तक पहुँचाने के लिए देते हैं।तो क्या आप यह पैसा इस बात के लिए देते हैं कि उसका इस्तेमाल किसी सार्वजनिक प्रदर्शन, राजनीतिक लोगों को साथ लेकर शक्ति प्रदर्शन या किसी दूसरे मकसद के लिए किया जाए?

     

    ज़कात एक इबादत और अमानत है।हमारे बुजुर्गों ने हमेशा सिखाया कि सदका और ज़कात देते समय दिखावे से बचना चाहिए। मदद इस तरह की जाए कि जरूरतमंद की इज्जत भी बनी रहे।इसलिए अगर ज़कात के नाम पर पैसा जमा किया जाता है, तो उस पैसे के इस्तेमाल और वितरण को लेकर सवाल करना अवाम का हक़ है। राशन वितरण में स्थानीय नगरसेवक की मौजूदगी पर भी सवाल वीडियो में यह बताया जाता दिखाई देता है कि राशन फलाई तंजीम, पालघर झोन की तरफ से लोगों की ज़कात और खैरात के माध्यम से दिया जा रहा है तथा राशन का वितरण स्थानीय नगरसेवक आरिफ कलाडिया के हाथों किया जा रहा है।यहाँ सवाल यह नहीं है कि किसी नगरसेवक या जनप्रतिनिधि का गरीबों की मदद के कार्यक्रम में आना गलत है या नहीं।सवाल यह है कि जब पैसा लोगों की ज़कात का है और उसका उद्देश्य हक़दार गरीबों तक मदद पहुँचाना है, तो राशन वितरण के लिए राजनीतिक व्यक्ति को बुलाकर सार्वजनिक रूप से वितरण करवाने और उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने की जरूरत क्यों पड़ी?

    क्या यह केवल मदद का कार्यक्रम था?

    या इसके साथ कोई सामाजिक, सार्वजनिक या राजनीतिक संदेश भी देना था?वीडियो का उद्देश्य क्या है?

    वीडियो में फलाई तंजीम की ओर से ज़कात और खैरात के राशन वितरण की बात कही जा रही है। कार्यक्रम में *हाजी यासीन पोची सहित तंजीम के पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद दिखाई देते हैं।*

    वीडियो बनाकर उसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया।

    ऐसे में समाज में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस वीडियो का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

    क्या उद्देश्य सिर्फ लोगों तक मदद की जानकारी पहुँचाना था, या इसके माध्यम से लोगों को आगे और अधिक चंदा/ज़कात देने के लिए प्रेरित करना भी था?

    यदि चंदा या ज़कात जुटाना उद्देश्य है, तो अवाम के सामने यह स्पष्ट होना चाहिए कि पैसा कहाँ से आया, कहाँ खर्च हुआ, कितने लोगों तक पहुँचा और कितने जरूरतमंदों को सहायता मिली।

    ज़कात देने वालों को हिसाब पूछने का अधिकार है मैं पालघर की अवाम से कहना चाहता हूँ आप अपनी मेहनत की कमाई से ज़कात निकालते हैं। आप भरोसे के साथ किसी संस्था को यह पैसा देते हैं कि वह सही हक़दार तक पहुँचे।

     

    इसलिए आप यह सवाल जरूर पूछें मेरी ज़कात कहाँ खर्च हुई?

    कितने जरूरतमंदों तक पहुँची?

    किस आधार पर राशन वितरित किया गया?

    कुल कितनी ज़कात जमा हुई?

    और उसका कितना हिस्सा गरीबों तक पहुँचा?

    ये सवाल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं।

    ये सवाल ज़कात की अमानत और जवाबदेही के हैं।

    अगर सब कुछ पारदर्शी और सही तरीके से हो रहा है, तो ज़कात देने वाली अवाम के सामने उसकी जानकारी रखने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

    मेरा विरोध मदद के खिलाफ नहीं

    मैं साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मेरा विरोध गरीबों की मदद के खिलाफ बिल्कुल नहीं है।गरीब की मदद करना नेक काम है। जरूरतमंद परिवार को राशन देना, उसके घर का चूल्हा जलाना और उसके परिवार का सहारा बनना इंसानियत है और ऐसी हर नेक पहल का सम्मान होना चाहिए।

    मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि—

    गरीब की मदद करते समय उसकी इज्जत और निजता भी बची रहनी चाहिए।उसकी मजबूरी को कैमरे के सामने लाकर सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करना क्या सही है?जिस व्यक्ति को आज राशन की जरूरत है, हो सकता है कल वह अपनी मेहनत से अपने पैरों पर खड़ा हो जाए। लेकिन सोशल मीडिया पर डाला गया उसका वीडियो वर्षों तक इंटरनेट पर मौजूद रह सकता है।

    इसलिए मदद करें, लेकिन मदद लेने वाले की मजबूरी को तमाशा न बनाएं।

    फलाई तंजीम से भी कुछ सवाल

    फलाई तंजीम, पालघर झोन से मेरा विनम्र सवाल है—

    ज़कात और खैरात के रूप में कितनी राशि जमा की जाती है?

    उसका कितना हिस्सा राशन वितरण पर खर्च किया जाता है?

    कितने जरूरतमंद परिवारों को इसका लाभ दिया गया?

    क्या राशन लेने वाले लोगों की फोटो और वीडियो बनाने से पहले उनकी अनुमति ली गई?

    गरीबों के चेहरे सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति के हाथों राशन वितरण करवाने का उद्देश्य क्या था?

    सोशल मीडिया पर वीडियो प्रसारित करने का उद्देश्य क्या था?

    क्या इसका उद्देश्य आगे और अधिक ज़कात या चंदा जमा करना भी है?

    इन सवालों का स्पष्ट जवाब अवाम के सामने आना चाहिए। मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर फैसला सुनाना नहीं है। लेकिन जब जनता की ज़कात और खैरात की बात हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हो जाती है।मदद इखलास से हो, दिखावे के लिए नहीं हमारे समाज में मदद की बहुत बड़ी परंपरा रही है। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में खड़े होते हैं। गरीबों की मदद करते हैं और जरूरतमंदों का सहारा बनते हैं।

    लेकिन मदद का सबसे खूबसूरत रूप वही है जिसमें मदद करने वाले का नाम पीछे रहे और मदद पाने वाले की इज्जत आगे रहे।

    गरीबों की मदद जरूर करें, लेकिन उनकी मजबूरी का प्रदर्शन न करें।ज़कात जरूर दें, लेकिन उसकी अमानत और हिसाब भी पूछें।मदद जरूर करें, लेकिन दिखावे से बचें।क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है—सवाल ज़कात की अमानत, गरीब की इज्जत और समाज के भरोसे का है।

     

    जावेद मजीद लुलानिया. पालघर 

    महाराष्ट्र उपाध्यक्ष, मायनॉरिटी डेमोक्रॅटिक पार्टी, पालघर

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